इन चंद शब्दों मे भाई - बहन  के अनमोल रिश्ते की गहरी परिभाषा छिपी हुई है इसे समझने के लिए दिमाग की नही, दिल की जरुरत है होती है, कहते हैं हमारे कितने ही चाचा ताऊ के भाई हो परन्तु जो दर्द हमारे लिए हमारे माँ जाये वीर को होगा वो किसी रिश्ते को नहीं होगा इसी तरह बहिन भी चाहे कितनी भी नाराज हो, लेकिन वो कभी सपने में भी अपने भाई के लिए बद्दुआ नहीं कर सकती, बहन के हाथ हमेशा भाई की सलामती के लिए ही प्रार्थना करते है।  भाई ..पिता, दोस्त, बहन  का ही रिश्ता नहीं निभाता अपितु वह तो कभी-कभी माँ बनकर बहन के सर पर आशीर्वाद का हाथ भी रखता है,यह दुनियाँ के सबसे अनमोल रिश्तों में से एक रिश्ता है,भाई-बहन के स्नेह को तोलने के लिए कोई तराजू नहीं बनी, एहसास ही बहुत कुछ   बयाँ कर देता है ,भाई चाहे छोटा हो या बड़ा पर उसके पद की गरीमा हमेशा बड़ी ही मानी जाती है,बहन के लिए हमेशा ढाल बनकर खड़ा होता है तो कभी आशीर्वाद स्वरुप स्नेह की वर्षा करता है,हमारे  तीज-त्यौंहार राखी,भैया दूज,भाई पंचमी ऐसे ही नहीं बनाए गये है यह त्यौहार हमें इन रिश्तों को निभाने  लिए तैयार रखते हैं,कहा जाता है हर चीज का एक वक्त होता है,उसके पीछे एक वजह होती है यदि राखी का त्यौहार ना होता तो किसी बहन को भाई की कलाई याद नहीं आती और भाई दूज का त्यौंहार नहीं होता तो भाई को बहन का आँगन याद नहीं आता। हमारे यहाँ विवाह में एक रस्म होती है जिसे भात कहा जाता है यह रस्म बडी ही भावुक होती है इस रस्म को निभाते वक्त बहन-भाई के स्नेह कि एक अलग ही अनुभूति होती है जिसे शब्दों में बयाँ करना नीर मे बनी तस्वीर को देखने जैसा है, परंतु बदलते समय मे आज कुछ भाई-बहन इस सुख से वंचित होते जा रहे हैं क्योंकि कुछ बहने थोडे से स्वार्थ के लिए मूर्खतापूर्ण विचारधारा से इस अनमोल रिश्तें के बीच दरार खड़ी कर लेती है,वह पिता की संपत्ति मे तो अधिकार लेने को तो तैयार रहती परंतु माता पिता के प्रति बन रही जिम्मेदारियों से मुक्त रहना चाहती। माना कि कानून ने माता -पिता की संपत्ति में बेटी को अधिकार दिया है परंतु साथ ही बेटी के निजी कर्तव्य भी होते हैं कि वो माता -पिता से जूडी जिम्मेदारियों को भी निभायें,बहन के मायरे जामने की रस्म अदा करते हुए मे भाई धीरे -धीरे माता- पिता की संपत्ति में से बहन को कुछ हिस्सा दे रहता है कई बार माताऐं भी अपनी बेटियों को महत्वकांक्षाओं के चलते भाभियों के खिलाफ कर देती हैं ऐसा करते वक्त माताएं भूल जाती हैं जिन बेटियों को भाभी के खिलाफ कर रही हैं,आने वाले वक्त में वह रिश्ता उन्हे ही आपस मे निभाना है और कहा भी जाता है कि 

 *"जाना है भाई के घर और बैठना भाभी के हाथ तले"** तो फिर क्यों यह दूरियाँ बढ़ाकर इस अनमोल   रिश्ते को खोखला कर देते हैं माना की खामियां कुछ भाभी मे है परंतु वह तुम्हारे घर में नए माहौल में आई है उस भाभी को तुम कितना कैसे अपना बनाते हो यह तुम्हारे व्यवहार पर भी निर्भर करता है साथ ही भाभियों को भी चाहिए कि वह अपनी ननद का मान सम्मान करें ,बहन बेटियां हमेशा लेने ही नहीं आती वो अपने बचपन को जीने  भी आती है आपके साथ कुछ स्नेह के पल बिताने भी आती है ।

बहन -भाई का रिश्ता अटूट बंधन होता है बहन-भाई आपस में कितने ही वर्षों तक एक दूसरे की देहरी ना चढ़े परंतु एक दूसरे की दुःख की आहट नही सुन सकते है ,सुख में भले ही एक दूसरे के शामिल ना हो परंतु दुःख में अपनी सारी कड़वाहट को भूलकर एक-दूसरे की तकलीफ में शामिल हो जाते हैं। हमारे बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि कोई भी भाई यदि बहिन  क्षेत्र के आसपास से भी गुजरता है,तो वह बहन से बिना मिले कभी नहीं आ पाता जबकि अगर चाचा ताऊ के बेटे होंगे तो शायद यह संभव नहीं हो पाता इसीलिए कहा गया है **काका- बाबा सौ माँ को जायो एक"* 

 इसी के लिए एक लघु कथा है...   एक भाई बहन थे दोनों बहन-भाइयों ने बहुत गरीबी के साथअपने बचपन जिया था,एक दूसरे पर जान छिड़कते थे,भाई अपने हिस्से के घी की रोटी बहन को खिलाता वह दुनियाँ के किसी भी कोने में भी जाता बहन के लिए कुछ ना कुछ जरूर लाता,बहन भी खुद नंगे पांव रहकर अपने भाई को स्कूल जाते हुए अपनी चप्पल पहना देती वो एक दूसरे के लिए इतने समर्पित थे कि एक दूसरे की आत्मा में बसते थे उनके बचपन की नोक-झोंक घर में एक खेल तमाशा था।

हंसी खुशी के साथ दोनों बहन- भाइयों की अपनी- अपनी गृहस्थी बस गयी,  लेकिन समय के साथ भाई पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ गया और बहन भी ससुराल की जिम्मेदारियों को निभाते वक्त कुछ परेशान रहने लगी दोनों ही अपनी -अपनी  जिम्मेदारियों को बखूबी निभा रहे थे लेकिन पारिवारिक कुछ मसलों के चलते हुए उनके बीच एक कड़वाहट ने जन्म ले लिया था और उनके मीठे से रिश्ते  में दरार आ गई यह बहुत ही प्यारा सा रिश्ता मनमुटाव के साथ कड़वाहट को जीने लगा,यहाँ तक की वह एक-दूसरे के बच्चों के विवाह तक मे देहरी पर चढ़ना ही भूल गए एक दूसरे का नाम लेना तक उन्हें पसंद नहीं था,वक्त का पहिया घूमता है,और एक दिन बहन बहुत गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं तभी भाई को यह सूचना मिलती है तो वह अपनी सारी कड़वाहटओं भूलते हुए तुरंत बहन के पास पहुंच कर पिता के समान सर पर हाथ रखकर सारी जिम्मेदारियों को निभाता है  उधर बहिन भी आशीर्वाद स्वरुप भाई का हाथ सर पर देखकर कड़वाहट को भुला देती है, यह रिश्ते ही कुछ ऐसे हैं कि इन रिश्तो को समझने के लिए दिमाग की नहीं दिल की जरूरत होती है ,यह बंधन ईश्वर का बनाया हुआ ऐसा बंधन है 

जो हमारी आत्माओं से जुड़े हुए होते हैं।हमें इस बंधन को निभाने के लिए थोड़ा धैर्य भी रखना होता है ईश्वर के बनाए हुए इस अनमोल रिश्ते को दिमाग से नहीं दिल से निभाना है ,भाई का स्नेह है दुनियाँ में सबसे कीमती पूंजी है, वही बहन की दुआएँ भाई परआने वाली हर विपत्ति में ढाल का काम करती हैं खुशनसीब है वह परिवार जिसमें यह रिश्ता निभाया जाता है 

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 शकुंतला टेलर ✍️