Ticker

6/recent/ticker-posts

महाश्वेता देवी की कहानी बायन पर आधारित नाटक ने झकझोरा दर्शकों को

https://www.ajmermuskan.page/2026/03/Kidney-specialist-Nephrologist-Dr-Chakrapani-Mittal-started-regular-consultation-services-at-Mittal-Hospital.html



महाश्वेता देवी की कहानी बायन पर आधारित नाटक ने झकझोरा दर्शकों को

तृतीय अजमेर थिएटर फेस्टिवल के अंतर्गत जवाहर रंगमंच पर हुई प्रभावशाली प्रस्तुति

अजमेर (अजमेर मुस्कान)। तृतीय अजमेर थिएटर फेस्टिवल के अंतर्गत चौथे व अंतिम दिन मंगलवार को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली, कला एवं संस्कृति विभाग, राजस्थान सरकार, जिला प्रशासन अजमेर तथा अजमेर विकास प्राधिकरण के सहयोग व अपना थियेटर, न्यू आदर्श शिक्षा समिति, आधुनिक नाट्य कला संस्थान, आप-हम संस्थान, कला अंकुर, इंडियन लेडीज क्लब, द टर्निंग पॉइंट पब्लिक स्कूल आदि सहयोगी संस्थाओं के द्वारा जवाहर रंगमंच पर प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की चर्चित कहानी बयान पर आधारित उषा गांगुली के निर्देशन में मंचित नाटक दर्शको के लिए एक गहन और संवेदनशील अनुभव साबित हुआ। यह नाटक समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, छुआछूत और अंधविश्वास जैसी कुरीतियों पर तीखा प्रहार करते हुए मानव जीवन के विविध पहलुओं के प्रति जागरूकता उत्पन्न करता नजर आया।

नाटक की कहानी की नायिका चंडी दासी है, जो डोम जाति से संबंध रखती है जो कम उम्र में ही उसे अपने पूर्वजों की परंपरा निभाते हुए मृत बच्चों को दफनाने का कठिन कार्य करना पड़ता है। पिता की मृत्यु के बाद गाँव के लोगों के नैतिक दबाव के कारण वह यह जिम्मेदारी निभाने के लिए मजबूर हो जाती है। इसी बीच सरकारी श्मशान घाट में कार्यरत मलिंदर से उसका प्रेम होता है और दोनों विवाह कर लेते हैं। कुछ समय तक उनका जीवन सामान्य और सुखद रहता है तथा उनके यहाँ एक बच्चे का जन्म भी होता है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब मलिंदर की बहन अपने नवजात बच्चे के साथ उनके घर आती है। चेचक से पीड़ित उस बच्चे की मृत्यु हो जाती है और अंधविश्वास से ग्रस्त लोग इसका दोष चंडी दासी पर मढ़ देते हैं। उसे ‘बायन’ अर्थात् बच्चा खाने वाली औरत घोषित कर दिया जाता है। समाज के इसी अंधविश्वास और भेदभाव के कारण चंडी दासी सम्मानजनक जीवन के अपने सभी अधिकार खो देती है।

एक रात तेज वर्षा के बीच चंडी दासी को चिंता होती है कि सियार बच्चों की दफनाई गई लाशों को खोदकर न निकाल लें। वह मरघट पहुँचकर उन्हें दोबारा दफनाने लगती है, लेकिन उसी समय गाँव वाले वहाँ पहुँच जाते हैं और उसके हाथ में लाश देखकर उसे बायन घोषित कर देते हैं। परिणामस्वरूप उसका पति भी उसे छोड़ देता है और चंडी दासी को श्मशान में ही निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश होना पड़ता है। यहीं से उसके संघर्ष, पीड़ा और अस्तित्व की मार्मिक कथा शुरू होती है।

मंचन के दौरान कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, पीड़ा और संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करते हुए गंभीर संवादों और सटीक मंच संयोजन ने नाटक को और अधिक प्रभावी बनात हुए दर्शको के मन पर गहरी छाप छोडी।

समारोह के प्रथम दिन राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष ने रंगकर्मियों के लिए अजमेर में जयपुर के जवाहर कला केंद की तरह अजमेर में भी कला केंद्र स्थापित करने की घोषणा भी की, जिसे उपस्थित रंगकर्मियों और कला प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक स्वागत किया।

मंचित नाटक के दौरान जवाहर रंगमंच दर्शकों से खचाखच भरा रहा। बड़ी संख्या में पहुंचे दर्शकों के कारण कई लोगों को सभागार में स्थान तक नहीं मिल सका। इससे नाटक और समारोह के प्रति शहरवासियों के उत्साह और रंगमंच के प्रति बढ़ती रुचि का स्पष्ट संकेत मिला।

नाटक में पोटशांगबम रीता देवी, शिल्पा भारती, पूजा गुप्ता, डॉ. अनामिका सागर, शाजिया बतूल, मधुरिमा तरफदार, पोली फुकन, शिवानी भार्तिया, अदिति आर्या, माधवी शर्मा, निशा, स्वर्णलता, मजीबुर रहमान, सुमन कुमार, सत्येन्द्र मलिक, अंकुर सिंह, नारायण पवार, विवेक कनौजिया, अजय कुमार, शिव प्रसाद गोंड, अनंत शर्मा, कान नाथ, नवीन सिंह ठाकुर, तबिश खान, हीरा लाल रॉय, विक्रम लेपचा, समीर रामटेके, सतीश कुमार। इत्यादि कलाकारों ने अपनी अभिनय प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन दर्शकों को पूरे समय नाटक से जोड़ा रखा और प्रस्तुति के अंत में कलाकारों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।

इस अवसर पर यॉबी जॉर्ज, निरंजन कुमार, राजेन्द्र सिंह, जुम्माखान, उज्जवल मित्रा, वरिष्ठ रंगकर्मी लाखन सिंह, विष्णु अवतार भार्गव, विकल्प सिंह, सहित शहर के रंगकर्मी, कलाकार व कलाप्रेमी उपस्थित थे।

दर्शक पूरे समय नाटक से जुड़े रहे और प्रस्तुति के अंत में कलाकारों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया जिससे रंगमंच तालियों से गूंज उठा।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ