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लाल लोई त्यौहार का सिंधी कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान में योगदान विषय पर सेमिनार संपन्न

लाल लोई त्यौहार का सिंधी कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान में योगदान विषय पर सेमिनार संपन्न

लाल लोई त्यौहार का सिंधी कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान में योगदान विषय पर सेमिनार संपन्न

लाल लोई त्यौहार का सिंधी कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान में योगदान विषय पर सेमिनार संपन्न

जोधपुर (अजमेर मुस्कान)।
राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली एवंसिंधी कल्चरल सोसायटी,जोधपुर के संयुक्त तत्वावधान में लाल लोई डि॒ण जो सिंधी कला, संस्कृति ऐं बो॒लीय जे वाधारे में योगदान* विषय पर सेमिनार का आयोजन चौपासनी हाउसिंग बोर्ड स्थित ए आर एक्सीलेंसी के सभागार में किया गया।  

लाल लोई त्यौहार का सिंधी कला, संस्कृति और भाषा के उत्थान में योगदान विषय पर सेमिनार संपन्न

सिंधी कल्चरल सोसायटी जोधपुर द्वारा सेमिनार पश्चात सांस्कृतिक गतिविधि के तहत गीत, संगीत एवं नृत्य का कार्यक्रम रखा गया। जिसमें समाज सभी वर्ग के सदस्यों ने भरपूर आनंद लिया।

कार्य क्रम की शुरुआत में लाल लोई विषय पर सेमिनार में वक्ताओं ने सिंधी भाषा को बढ़ावा देने पर अपने बहुमूल्य विचार रखे।  सेमिनार पश्चात कैंप फायर के रूप में अग्नि प्रज्वलित करते हुए गीत गाए, नृत्य किया गया साथ ही प्रसाद आदि चढ़ाया गया । इसका आध्यात्मिक अर्थ है पुराने को त्यागना और नए को अपनाना। यह त्योहार मन की शुद्धि और नकारात्मकता को आग में जलाने का प्रतीक है।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक एवं रंगकर्मी गोविंद करमचंदानी ने बताया कि लाल लोई  सिंधी समाज का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे सर्दियों की विदाई और फसल के आगमन की खुशी में मनाया जाता है। यह उत्तर भारत के 'लोहड़ी' त्योहार का  सिंधी रूप है।

वरिष्ठ रंगकर्मी हरीश देवनानी ने बताया कि लाल लोई केवल एक त्यौहार नहीं है, बल्कि यह सिंधी समुदाय के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक सशक्त माध्यम है। सिंधी भाषा और संस्कृति के उत्थान में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह त्यौहार सिंधी सांस्कृतिक पहचान भी देता है।

राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली के सदस्य अशोक मूलचंदानी ने बताया लाल लोई के पूजन के वक्त  तिरमूरी पर सिंधी लोग ' पल्लव,  गाते हुए ईश्वर से  सिंधी भाषा में ही प्रार्थना की जाती है। इसमें सुख-शांति और समाज की उन्नति की कामना की जाती है, जो सिंधी संस्कारों को अगली पीढ़ी में स्थानांतरित करने का तरीका है। साथ ही उन्होंने इसे गाकर भी प्रस्तुति दी।

सचिव विजय भक्तानी ने बताया कि विभाजन के बाद, सिंधी समुदाय पूरे विश्व में फैल गया। ऐसे में 'लाल लोई' जैसे त्यौहार बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करते हैं। जब सभी एक साथ मिलकर अग्नि के चारों ओर इकट्ठा होते हैं, तो यह सामूहिक रूप से उनकी सिंधी पहचान को मजबूत करता है। सिंधी भाषा का जीवंत उपयोग इस मौके पर देखने को मिलता है।

इस मौके पर गीत संगीत का विशेष कार्यक्रम भी रखा गया जिसमें  त्यौहार के दौरान गाए जाने वाले पारंपरिक लोक गीतों और तथा लोक नृत्य के माध्यम से युवक युवतियों ने शमा बांध दिया, "लाल लोई, अची गई...पुरानी लत वेई, नई लत आई" आदि गीतों से धूम मचा दी। अंत में  पल्लव की प्रस्तुति से संजय भगत सतवानी, रीना कमलेश और पिंकी चंदानी ने भी भक्ति मय माहौल में अलग ही रंग जमा दिया।

प्राचार्य अनिल लालवानी ने कहा कि  लाल लोई, सिंधी संस्कृति,  'भाईचारे' पर आधारित त्यौहार है। लाल लोई पर जब मोहल्ले के लोग मिलकर 'सेसा' (प्रसाद) बांटते हैं, तो यह सिंधी समाज की एकता को दर्शाता है। यह त्यौहार युवाओं को सिखाता है कि अपनी संस्कृति से साथ गर्व से  कैसे जिया जाय।

संचालन ललित खुशलानी ने किया, रितिका मनवानी ने इस मौके पर काव्य पाठ किया। डॉ प्रदीप गेहानी, रमेश खटवानी, राजकुमार आसुदानी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस मौके पर सिंधी समाज के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे  जिनमें मुख्य रूप से नरेंद्र लोकवाणी, तीर्थ डोडवानी, हरीश दरयानी, राम चांदवानी, उत्तम सुखानी, रमेश झामनानी, प्रेम चेलानी, रीना कमलेश, कैलाश थावानी, अशोक कृपलानी, गुरमुख रेलवानी, डॉ जितेंद्र  वगानी, दयाराम परयानी, पूनम देवनानी, राजकुमार परमानी, कलावंती देवनानी, प्रभु टेवाणी,भगवान शिवलानी,केडी इसरानी,राजेश भैरवानी, नारायण खटवानी, स्मिता थदानी, विजय संभावनी, प्रकाश खेमानी, राजकुमार अथवानी, प्रेम झामनानी, हरिकिशन गोलानी,पिंकी चंदानी, दीप्ति गंगवानी, किशन लालवानी, गोविंदराम सबनानी, राहुल ठाकुरानी, राजू अठवाणी राजकुमारी देवानी, नरेंद्र पंजाबी, जय किशन खुशलानी,  कन्हैयालाल सुखानी, प्रदीप दंडवानी, प्रेम चेलानी, आदि ने  परिवार सहित सक्रियता से सहभागिता निभाई।

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