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500 ग्राम के प्रीटर्म नवजात ने जीती जिंदगी की जंग, 100 दिन बाद मां की गोद में लौटा

500 ग्राम के प्रीटर्म नवजात ने जीती जिंदगी की जंग, 100 दिन बाद मां की गोद में लौटा

500 ग्राम के प्रीटर्म नवजात ने जीती जिंदगी की जंग, 100 दिन बाद मां की गोद में लौटा

अजमेर संभाग में अब तक का सबसे कम वजन और कम अवधि में जन्मे शिशु के सफल उपचार का मामला

मित्तल हॉस्पिटल के नियोनेटालॉजिस्ट, गायनेकोलॉजिस्ट, चाइल्ड स्पेशलिस्ट सहित एनआईसीयू नर्सिंग स्टाफ की टीम भावना और कड़ी मेहनत से मिली सफलता

अजमेर (अजमेर मुस्कान)। मित्तल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, अजमेर में चिकित्सा क्षेत्र की एक उल्लेखनीय सफलता सामने आई है। यहां 8 जनवरी 2026 को मात्र 5 माह (प्रीटर्म) में जन्मे 500 ग्राम वजन के अत्यंत नाजुक नवजात शिशु को चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के समर्पित प्रयासों से 100 दिन बाद सुरक्षित उसकी मां की गोद में सौंपा गया। डिस्चार्ज के समय शिशु का वजन बढ़कर 1700 ग्राम हो गया।

यह अजमेर संभाग में अब तक का सबसे कम वजन और कम अवधि में जन्मे शिशु का सफल उपचार माना जा रहा है। जन्म के बाद से लेकर 100 दिनों तक शिशु का जीवन संघर्षपूर्ण रहा, जिसमें कई बार उसकी स्थिति अत्यंत गंभीर हुई, लेकिन चिकित्सकीय टीम के धैर्य, अनुभव और निरंतर देखभाल ने अंततः उसे सुरक्षित जीवन प्रदान किया।

इस जटिल उपचार में नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ रोमेश गौतम, गायनेकोलॉजिस्ट डॉ प्रीतम कोठारी, शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ प्रशांत माथुर, डॉ प्रीति गर्ग तथा एनआईसीयू प्रभारी सिस्टर स्वर्णलता एंड्रयूज सहित पूरी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

डॉ रोमेश गौतम ने बताया कि जन्म के समय शिशु के फेफड़े, मस्तिष्क और आंतें पूरी तरह विकसित नहीं थीं और उसका आकार हथेली से भी छोटा था। उसे रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (आरडीएस) से बचाने के लिए सर्फेक्टेंट थेरेपी दी गई, जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार हुआ। उपचार के शुरुआती 20 से 22 दिनों में उसका वजन घटकर 450 ग्राम तक पहुंच गया था, लेकिन बाद में धीरे धीरे सुधार हुआ और एक माह में उसने दूध पचाना शुरू कर दिया।

उन्होंने बताया कि ऐसे शिशुओं के उपचार में केवल जीवित रखना ही लक्ष्य नहीं होता, बल्कि उनके सभी अंगों,आंख, मस्तिष्क, हृदय और फेफड़ों का समुचित विकास सुनिश्चित करना भी आवश्यक होता है। इसके लिए नियमित जांच और सतत निगरानी की जाती है।

विशेष बात यह रही कि इस पूरे उपचार का खर्च राजस्थान सरकार की ईएसआईसी योजना के तहत वहन किया गया, जिससे अभिभावकों पर कोई आर्थिक बोझ नहीं पड़ा। उपचार के दौरान संक्रमण से बचाव के लिए शिशु को नियंत्रित और सुरक्षित वातावरण में रखा गया तथा 24 घंटे एक चिकित्सक और नर्सिंग स्टाफ की विशेष निगरानी में रखा गया।

तो होते 25 लाख तक खर्च.....

ऐसे नवजात यदि देश के बड़े से बड़े चिकित्सा संस्थान में पैदा हों तो भी वहां की जीवन रक्षा दर 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। ऐसी स्थिति में जन्में बच्चे पर वहां आने वाला खर्च भी सामान्य रूप से देखा जाए तो कम से कम 25 लाख रुपए से ज्यादा ही आता है। नवजात को वैसा ही उपयुक्त वातावरण मित्तल हॉस्पिटल में उपलब्ध कराया गया।

समय पर लिए चिकित्सकीय निर्णय...

गायनेकोलॉजिस्ट डॉ प्रीतम कोठारी ने बताया कि प्रसूता की स्थिति भी प्रारंभ में अत्यंत गंभीर थीए जिसमें मां और शिशु दोनों के जीवन को खतरा था। समय पर लिए गए चिकित्सकीय निर्णय और सर्जरी से दोनों की जान बचाई जा सकी।

मां को पूरी तरह से कर दिया प्रशिक्षित....

शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ प्रीति गर्ग ने कहा कि ऐसे मामलों में चिकित्सकीय टीम के साथ.साथ परिवार का धैर्य और सहयोग भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस मामले में परिजनों ने पूरा सहयोग दिया जिससे उपचार सफल हो सका। नवजात शिशु के आगे के जीवन के लिए उसकी मां को पूरी तरह से प्रशिक्षित कर दिया गया।

हॉस्पिटल प्रबंध मंडल के सुनील मित्तल, डॉ दिलीप मित्तल, मनोज मित्तल, डॉ चक्रपाणि मित्तल, सार्थक मित्तल, सीईओ एस के जैन, वाइस प्रेसिडेंट श्याम सोमानी, डीजीएम विजय रांका, वीपीओ ऑपरेशन डॉ विद्या दायमा, नर्सिंग अधीक्षक राजेन्द्र कुमार गुप्ता ने मित्तल हॉस्पिटल में प्रीटर्म और लो बर्थ वेट जन्मे शिशुओं के उपचार में नए आयाम स्थापित किए जाने का श्रेय चिकित्सकों और स्टाफ की टीम भावना, समर्पण और आधुनिक सुविधाओं को दिया है। उन्होंने कहा कि नवजात शिशुओं की उन्नत चिकित्सा सुविधाओं के कारण जटिल से जटिल मामलों का भी सफल उपचार संभव हो पा रहा है।

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