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समय-चेतना की वैज्ञानिक संरचना पर आधारित है भारतीय पंचांग : प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल

समय-चेतना की वैज्ञानिक संरचना पर आधारित है भारतीय पंचांग : प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल

समय-चेतना की वैज्ञानिक संरचना पर आधारित है भारतीय पंचांग : प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल

कुलगुरु महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर

अजमेर (अजमेर मुस्कान)। समय केवल घड़ी की सुइयों का अनुशासन नहीं है; वह ब्रह्मांडीय गति का जीवंत प्रतिबिंब है। मनुष्य ने जब से आकाश की ओर देखा है, तभी से उसने सूर्य की यात्रा, चन्द्रमा की कलाओं और नक्षत्रों की निःशब्द गति में समय का रहस्य पढ़ना आरम्भ किया। यही प्रयास आगे चलकर कैलेंडर और पंचांग जैसी समय-गणना प्रणालियों के रूप में विकसित हुआ। आज विश्व-समाज जिस ग्रेगोरियन कैलेंडर को समय-निर्धारण का सार्वभौमिक मानक मानता है, वह मुख्यतः प्रशासनिक सुविधा और ऐतिहासिक संशोधनों का परिणाम है; किन्तु भारतीय परंपरा में विकसित पंचांग समय को केवल तिथियों के क्रम में नहीं, बल्कि खगोलीय लयों के वैज्ञानिक सामंजस्य में समझने का प्रयास है।

पंचांग समय का बहुआयामी विज्ञान है। सामान्यतः प्रचलित कैलेंडर जहाँ केवल दिनांक और वार की सूचना देता है, वहीं भारतीय पंचांग पाँच मूलभूत अंगों पर आधारित है— तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। इन्हीं पाँच तत्वों के कारण इसे ‘पंचांग’ कहा गया। यह केवल तिथियों की सूची नहीं, बल्कि सूर्य और चन्द्रमा के सापेक्षिक स्थान, नक्षत्रीय विभाजन, ग्रह-स्थितियों और काल-खंडों की सूक्ष्म खगोलीय गणना का जीवंत दस्तावेज है।

भारतीय खगोल-चिंतन में आकाश को 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। चन्द्रमा लगभग 27.3 दिनों में पृथ्वी की परिक्रमा करता है, और इसी गति के आधार पर आकाशीय पथ को नक्षत्रों में बाँटा गया है। प्रत्येक नक्षत्र लगभग 13°20’ का विस्तार लिए हुए है—जो गणितीय सटीकता का परिचायक है। तिथि सूर्य और चन्द्रमा के कोणीय अंतर पर आधारित है। जब दोनों एक ही देशांतर पर होते हैं तो अमावस्या, और जब 180° के अंतर पर होते हैं तो पूर्णिमा होती है। 360° को 30 भागों में विभाजित करने पर प्रत्येक 12° के अंतर से एक तिथि निर्मित होती है।

सूर्य एवं चन्द्रमा के संयुक्त अंशों से 27 योग निर्मित होते हैं, जबकि तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है। एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक का काल ‘वार’ कहलाता है—जो पृथ्वी की वास्तविक गति पर आधारित है।

सप्ताह में सात दिन होने का वैज्ञानिक आधार है। भारतीय परंपरा में समय-गणना नौ ग्रहों पर आधारित है—सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। राहु-केतु छाया ग्रह माने गए हैं, इसलिए मुख्य सात ग्रहों के आधार पर सप्ताह के सात दिन निर्धारित किए गए। दिन-रात को मिलाकर ‘अहोरात्र’ कहा गया, जिसे 24 ‘होरा’ में विभाजित किया गया। ‘अहो’ और ‘रात्रि’ के संयोग से ‘होरा’ शब्द बना। ग्रहों के होरा-क्रम के आधार पर ही वारों का नामकरण हुआ—प्रथम होरा जिस ग्रह का, उस दिन का नाम उसी पर आधारित। इस प्रकार रविवार, सोमवार, मंगलवार आदि की संरचना खगोलीय गणना का परिणाम है, न कि केवल सांस्कृतिक परंपरा का।

वर्ष में बारह महीने का आधार भी वैज्ञानिक है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगभग 365.25 दिनों में करती है, जबकि चन्द्रमा पृथ्वी की लगभग 12 परिक्रमाएँ करता है। यही कारण है कि वर्ष में 12 महीनों की व्यवस्था की गई। भारतीय पंचांग में सौर वर्ष सूर्य की गति पर एवं चन्द्र वर्ष चन्द्रमा की गति पर आधारित है। चन्द्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जो सौर वर्ष से लगभग 11 दिन कम है। इस अंतर को संतुलित करने हेतु प्रत्येक तीन वर्ष में ‘अधिक मास’ जोड़ा जाता है। यह खगोलीय विसंगति के वैज्ञानिक समाधान का अद्भुत उदाहरण है।

महीनों के नामकरण का आधार नक्षत्रीय है। भारतीय पंचांग में महीनों के नाम उस नक्षत्र पर आधारित हैं जिसमें पूर्णिमा पड़ती है। चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ, श्रवण से श्रावण, अश्विनी से आश्विन, कृत्तिका से कार्तिक, मृगशिरा से मार्गशीर्ष, पुष्य से पौष, मघा से माघ, पूर्वा फाल्गुनी से फाल्गुन।

यह नामकरण खगोलीय अवलोकन पर आधारित है, न कि किसी राजा या ऐतिहासिक घटना पर।

भारतीय ग्रंथों में घटनाओं का उल्लेख ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति सहित मिलता है। उदाहरणतः वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म का वर्णन चैत्र शुक्ल नवमी, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में हुआ है। इसी प्रकार रामचरितमानस में नवमी तिथि, अभिजीत मुहूर्त और मध्यान्ह काल का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि भारतीय परंपरा में तिथि-निर्धारण ग्रह-स्थिति के आधार पर किया जाता था।

वर्तमान ग्रेगोरियन प्रणाली रोमन परंपरा से विकसित हुई- Romulus ने 10 महीनों का 304 दिन का वर्ष बनाया। Numa Pompilius ने जनवरी और फरवरी जोड़े। 46 ईसा पूर्व में Julius Caesar ने 365 दिन और लीप वर्ष की व्यवस्था की। 1582 में पोप ग्रेगोरी XIII ने संशोधन कर 10 दिन हटाए और आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर का स्वरूप दिया। स्पष्ट है कि यह प्रणाली कई ऐतिहासिक परिवर्तनों का परिणाम है, जबकि भारतीय पंचांग खगोलीय सिद्धांतों पर आधारित सतत परंपरा है।

भारतीय प्रणाली गतिशील है—तिथियाँ खगोलीय गति के अनुसार घट-बढ़ सकती हैं। ग्रेगोरियन प्रणाली स्थिर है—प्रशासनिक सुविधा हेतु। भारतीय पंचांग समय की गणना का मात्र सांस्कृतिक उपकरण नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय गति का वैज्ञानिक प्रतिरूप है। सप्ताह की संरचना ग्रह-क्रम पर आधारित है। तिथि सूर्य-चन्द्र के कोणीय अंतर पर आधारित है। मास नक्षत्रीय स्थिति पर आधारित है। वर्ष सौर-चन्द्र समन्वय पर आधारित है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम वैश्विक समन्वय हेतु ग्रेगोरियन प्रणाली का उपयोग करते हुए भी अपनी वैज्ञानिक विरासत—भारतीय पंचांग—को समझें और उसके तार्किक आधार को पुनः प्रतिष्ठित करें।

भारतीय समय-दृष्टि हमें यह सिखाती है कि समय केवल दिनांक नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ मनुष्य के सामंजस्य का जीवंत संकेत है।

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