ग्रीष्म ऋतु में दोपहर के समय पशुओं का भारवाहन एवं कृषि प्रयोजनार्थ उपयोग लेने से बचें
अजमेर (अजमेर मुस्कान) ग्रीष्म ऋतु में दोपहर के समय पशुओं का भारवाहन, कृषि एवं अन्य श्रम संबंधी कार्यों में उपयोग लेने से बचना चाहिए।
पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. नवीन परिहार ने बताया कि वर्तमान में जिले के अधिकांश भागों में तापमान में अत्यधिक वृद्धि प्रारम्भ हो चुकी है। भारवाहक पशुओं यथा घोड़े, गधे, खच्चर, बैल, भैंसा आदि को तीव्र धूप एवं अत्यधिक गर्मी में कार्य हेतु प्रयुक्त किए जाने से उन्हें हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, अत्यधिक थकावट तथा मृत्यु जैसी गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही गर्मी के कारण प्राकृतिक जल स्त्रोतों के सूख जाने से पशु एवं पक्षियों के लिए पेयजल की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। पशुओं के कल्याण के लिए इससे संबंधित कई विधिक प्रावधान हैं।
उन्होंने बताया कि पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960 के अनुसार जीव-जन्तु की देखभाल अथवा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य जीव-जन्तु का कल्याण सुनिश्चित करना है। पशु को अनावश्यक पीड़ा या यातना से बचाने के लिए सभी युक्तियुक्त उपाय किए जाए। भार ढ़ोने वाले और माल ढ़ोने वाले पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण नियम, 1965 के अनुसार क्षेत्र में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहने पर दोपहर 12 बजे से 3 बजे के मध्य पशुओं का उपयोग नहीं किया जाए।
उन्होंने बताया कि पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण (पशुओं का पैदल परिवहन) नियम, 2001 के अनुसार 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर किसी जानवर का पैदल परिवहन नहीं किया जाएगा। ग्रीष्मकाल के दौरान जिले के संबंधित विभागों, स्थानीय निकायों, पुलिस प्रशासन एवं अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा अपने कार्यक्षेत्र में दोपहर 12 बजे से 3 बजे के मध्य पशुओं का भारवाहन एवं कृषि कार्यों में उपयोग प्रतिबंधित करवाना चाहिए। इसकी प्रभावी मॉनिटिरिंग करें। यातायात के लिए उपयोग में लाए जा रहे पशुओं के लिए पर्याप्त छाया, शीतल एवं स्वच्छ पेयजल और पौष्टिक चारे की व्यवस्था करने के लिए पशु मालिकों को जागरुक करावें।
उन्होंने बताया कि ग्रीष्मकाल में नियमित रूप से गुजरने वाले एवं कार्यशील पशुओं के लिए जन सहभागिता से पशु आश्रय स्थलों, गौशालाओं, चारागाहों एवं मार्गों के आसपास उपयुक्त स्थानों पर जलकुंडों की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। इससे पशुओं को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सकेगा।
उन्होंने बताया कि ग्रीष्म ऋतु में पक्षियों के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जन-सहभागिता से विद्यालयों, राजकीय संस्थानों, कार्यालयों एवं सार्वजनिक स्थलों, घरों इत्यादि उपयुक्त स्थानों पर परिड़े (जल पात्र) लगाने के लिए आम जन एवं स्वयंसेवी संगठनों को प्रेरित करें। स्थापित किए गए जल कुण्डों एवं परिड़ों में नियमित रूप से जल भराव सुनिश्चित करने के लिए संबंधित विभागों, स्वयंसेवी संस्थाओं, गौशालाओं, सामाजिक संगठनों एवं जनसहयोग को प्रोत्साहित करने से इन व्यवस्थाओं का सतत संचालन बना रहेगा।

0 टिप्पणियाँ