विभाजन ने तोड़ा लेकिन हमने हार नहीं मानी, आज राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे
विभाजन की पीड़ा को याद रखें, नई पीढ़ी को बताएं पूर्वजों के पुरुषार्थ की गाथा : देवनानी
विभाजन की विभीषिका से विस्थापन की अमरगाथा तक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी रहे मुख्य अतिथि
अजमेर (अजमेर मुस्कान)। सिन्धु शोध पीठ द्वारा विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में ‘‘विभाजन की विभीषिका से विस्थापन की अमर गाथा तक’’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन गुरुवार को महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय के स्वराज सभागार में किया गया। कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम ऎतिहासिक व दीर्घकालिक जन आंदोलन अवश्य था, लेकिन इसकी परिणति भारत विभाजन की अकल्पनीय त्रासदी रूप में हुई। द्विराष्ट्र सिद्धांत पर आधारित यह एक भौगोलिक विभाजन ही नहीं अपितु भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक, सामाजिक व आत्मा का विघटन था जिसने भारत, पाकिस्तान दोनों देशों की जनता को इस सीमा तक झकझोर दिया कि इसका दंश आज तक झेलते आ रहे है। 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन उससे एक दिन पहले, 14 अगस्त को पाकिस्तान अस्तित्व में आया और इसके साथ ही शुरू हुई इतिहास की सबसे भीषण मानवीय त्रासदियों में से एक- जिसे आज हम विभाजन विभीषिका के नाम से जानते है।
उन्होंने कहा कि विभीषिका की स्मृति को जीवित रखने और इससे सीख लेने के लिए भारत सरकार ने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2021 में 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृत दिवस के रूप में घोषित किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने 14 अगस्त 2021 को इस स्मृति दिवस की घोषणा करते हुए कहा था कि विभाजन के समय देशवासियों को हुई पीड़ा को कभी भुलाया नहीं जा सकता। लाखों बहनों-भाईयों को विस्थापन और अमानवीय हिंसा का शिकार होना पड़ा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने विभाजन विभीषिका दिवस मनाने की परम्परा आरम्भ की। यह उस समय मारे गए व्यक्तियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
देवनानी ने कहा कि वर्ष 1947 का विभाजन भारत के इतिहास की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक था। विभाजन ने लाखों परिवारों को अपनी जन्मभूमि, घर-बार और संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर किया। असंख्य लोगों ने अपनों को खोया और अमानवीय परिस्थितियों में विस्थापन का दर्द सहा। उन्होंने कहा कि विभाजन ने हमें तोड़ा जरूर, लेकिन हम हारे नहीं। विपरीत परिस्थितियों में भी विस्थापित समाज ने साहस, संघर्ष और कर्मठता के साथ स्वयं को पुनस्र्थापित किया।
उन्होंने कहा कि विभाजन भौगोलिक भाग पर नहीं होकर संस्कृति और सामाजिक आत्मा का हुआ था। उस समय बंगाल, पंजाब तथा सिंध प्रान्त विभाजन से सर्वाधिक प्रभावित हुए थे। बंगाल और पंजाब का कुछ भाग भारत में रहा। सिंध तो पूरा ही अलग हो गया। यह विभाजन भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़कर सांस्कृतिक और सामाजिक आत्मा का हुआ था। तत्कालीन नेताओं ने नेतृत्व प्राप्ति की चाह से विभाजन कराया। इसके लिए दोषी व्यक्तियों को समाज को हमेशा याद रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि विभाजन केवल ऎतिहासिक घटना नहीं थी, वह पीढ़ियों तक चलने वाला मनोवैज्ञानिक आघात था। आज भी लाखों परिवारों में उस त्रासदी की स्मृति जीवित है। अपने इतिहास को भूलने वाली संस्कृति नष्ट हो जाती है। इतिहास नई पीढ़ी लिए मार्ग निर्धारक होता है। विभाजन की पीड़ा को भी नई पीढ़ी को बताया जाना आवश्यक है। तभी उन्हें अहसास होगा कि आज की पीढ़ी की उपलब्धि पुरानी पीढ़ी के पुरूषार्थ का फल है। आज एआई के युग में अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहिए। नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों का इतिहास सुनाना चाहिए। खाली समय में नाना-नानी और दादा-दादी के साथ बैठकर इतिहास को जानना चाहिए।
देवनानी ने कहा कि विस्थापित परिवारों ने अपने परिश्रम, प्रतिभा और दृढ़ इच्छाशक्ति से न केवल अपना जीवन दोबारा खड़ा किया, बल्कि देश के विकास और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज विभिन्न क्षेत्रों में सिंधी एवं विस्थापित समाज के लोगों की उल्लेखनीय उपलब्धियां इस बात का प्रमाण हैं कि कठिन परिस्थितियां भी उनके संकल्प और पुरुषार्थ को नहीं रोक सकीं। विभाजन की सबसे ज्यादा पीड़ा इसी समाज ने झेली है। सिंधी समाज सदैव ही कर्मशील और मेहनती रहा है। यह मेहनत राष्ट्रहित में समर्पित रही है। देश के प्रति प्रेम के भाव ने ही हेमु कालाणी को अपना सर्वस्व समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। आज भी सिंधी समाज राष्ट्र के लिए सर्वाधिक समर्पण करने के लिए तत्पर है।
उन्होंने कहा कि विभाजन विभीषिका दिवस को मनाने के कुछ निहितार्थ, जैसे- विभाजन की त्रासदी को स्मरण कर, भावी पीढ़ियों केा उसकी चेतावनी देना, साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता का संदेश देना, मानवधिकारों, शांति और सहिष्णुता को बढ़ावा देना इत्यादि। इसके अंतर्गत कई स्कूलों, विश्वविद्यालयों में विभाजन पर आधारित चितर्् प्रदर्शनी, सेमीनार और भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है। केन्द्र सरकार द्वारा पार्टिशयन म्यूजियम अमृतसर और दिल्ली में स्थापित किया है, जहां पीड़ितों की कहानियां, चित्र, कपड़े, पासपोर्ट आदि संरक्षित है।
कुलगुरू प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने संगोष्ठी में विभाजन के दौरान विस्थापित हुए परिवारों के संघर्ष, पुनर्वास, सामाजिक योगदान तथा राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए। विभाजन की स्मृतियों को संजोकर रखना आवश्यक है, ताकि भावी पीढ़ी इतिहास की वास्तविकता को समझ सके और सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता के महत्व को आत्मसात कर सके।
सिन्धु शोध पीठ के निदेशक प्रो. सुभाष चन्द्र ने हमें अपने इतिहास से सीख लेते हुए ऎसी परिस्थितियों को दोबारा उत्पन्न नहीं होने देना चाहिए। देश की एकता और अखंडता सर्वाेपरि है। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे विभाजन की विभीषिका और विस्थापितों के संघर्ष की गाथा को समझें तथा राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं।
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी सुरेश सिंधी ने विस्थापन में जुड़े अपने परिवार के संस्मरण साझा किए। विभाजन के दौरान जिन लोगों ने अपना सब कुछ खो दिया, उनकी संघर्षगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है।
सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अतिरिक्त निदेशक एवं साहित्यकार डॉ. राजेश व्यास ने कहा कि आजादी के समय केवल भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ। यह सांस्कृतिक विभाजन भी था। कश्मीर की प्रसिद्ध शारदा पीठ भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चली गई। इसके बावजूद हमने सनातन और संस्कृति को जीवित रखा।
डॉ. व्यास ने कहा कि कश्मीर के राजा ललितादित्य और शारदा पीठ का उल्लेख करते हुए कहा कि शारदापीठ नालंदा और तक्षशिला की तरह भारत की एक महत्वपूर्ण शिक्षापीठ थी जिसने पूरे विश्व को भारतीय ज्ञान परम्परा की रोशनी में आलोकित किया। विभाजन के समय और उसके बाद विस्थापित होकर आए लोगों ने पुरूषार्थी बनकर परिश्रम किया और भारत की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखा।
मदस विश्वविद्यालय में अनुवादित होगी सिंधी भाषा की पुस्तकें
विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी भाषा और साहित्य हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके संरक्षण के साथ-साथ नई पीढ़ी को सिंधी साहित्य से जोड़ना आवश्यक है। सिंधी भाषा एवं साहित्य के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जाएगी।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में सिंधी भाषा की पुस्तकों के अनुवाद से शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों को लाभ मिलेगा तथा सिंधी साहित्य की समृद्ध परंपरा देशभर में पहुंच सकेगी। उन्होंने सिंधी भाषा के अध्ययन, शोध और अनुवाद कार्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

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