नई पीढी को सिन्ध के इतिहास, भाषा, संस्कृति, त्याग व तपस्या का डिजिटल से ज्ञान कराना आवश्यक
सिन्धी भाषा, साहित्य व संस्कारों से जोड़ने के विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन
अजमेर (अजमेर मुस्कान)। सिन्ध इतिहास एवं साहित्य शोध संस्थान सिन्धी समाज महासमिति द्वारा संचालित की ओर से युवा पीढ़ी को सिन्धी भाषा, साहित्य व संस्कारों से जोडने के विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन स्वामी कॉम्पलेक्स पर वरिष्ठ समाजसेवी व शिक्षाविद् ईश्वर ठाराणी की अध्यक्षता में आयोजित की गई।
ईश्वर ठाराणी ने कहा कि अगस्त 1947 में विभाजन का दुर्भाग्य रहा कि भारत का विभाजन बोली के आधार पर सिन्ध अलग किया गया। जो सबसे अधिक नुकसान देही हुआ, परन्तु उस समय के हमारे वरिष्ठजनों ने बच्चों को शिक्षा के जोड़ने के लिये मुम्बई से अध्ययन करवाकर बोर्ड परीक्षाएं करवाई व सफल होकर अजमेर ही नहीं अन्य शहरों में भी सिन्धी भाषा के विद्यालय प्रारम्भ हुए। वर्तमान सरकार ने यह दूरदर्शी निर्णय लिया है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो रही है, परन्तु बच्चों के माता पिता को ही प्रेरणा देनी होगी। हमारा विकास व समृद्धि मातृभाषा से ही होगी।
अभियांत्रिकी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राधाकिशन मोटवाणी ने कहा कि नई पीढ़ी को जोड़ने के लिये इतिहास व साहित्य शोध संस्थान को अलग अलग विषयों के विशेषज्ञों को जोड़कर समाधन के लिये टोली को जिम्मेदारी दी जाए, जो निरंतर बैठकें करके सही समाधान की दिशा में इतिहास का लेखन व पुर्नलेखन कर प्रस्तुत करें। अभियांत्रिकी महाविद्यालय के कम्प्यूटर ज्ञान के विद्यार्थी भी सहयोगी बन सकते हैं। हम सही तथ्यों के साथ जानकारी तैयार करेगे तो युवा स्वाकार करेगें। मातृभाषा ही संस्कृति की वाहक है।
महेन्द्र कुमार तीर्थाणी ने कहा कि नई पीढ़ी को हमारे सन्त महात्मा व हमारे गोत्र, उपनाम, तीज त्यौहार, शूरूवीर, सिन्ध के पुरातत्व का ज्ञान कराने के लिये बाल्यकाल से ही सिन्धी भाषा व संस्कृति से जोड़ने के लिये बाल संस्कार शिविरों के आयोजन के साथ राष्ट्रीय सिन्धी भाषा विकास परिषद के सहयोग से सर्टीफिकेट कोर्स, डिप्लोमा व एडवांस डिप्लोमा कोर्स के कार्यक्रम भारतीय सिन्धु सभा की ओर से सभी सामाजिक संगठनों के सहयोग से किये जा रहे हैं।
संगोष्ठी का शुभारंभ संस्थान के अध्यक्ष कवंल प्रकाश किशनानी ने अब तक किये गये प्रयासों की जानकारी देते हुये बताया कि श्री अमरापुर स्थान पर एक सिन्धु इतिहास व साहित्य से जुडी हुई शोध संस्थान की स्थापना करते हुए अलग-अलग साहित्यकारों के लिखित पुस्तकों का संकलन किया गया है। अलग अलग विषयों पर शोध करने हेतु सिन्ध के लोक गीत, पहनावा, व्यंजन, महापुरूषों की जीवन परिचय की विस्तृत जानकारी की पुस्तकें सिन्धी, हिन्दी व अंग्रेजी में लिखित उपलब्ध हैं। हम प्रयास करेगें कि इस विषय को देश दुनिया में निवास करने वाले युवा अपने अध्ययन के साथ भाषा के ज्ञान से जुडें। अब समय डिजिटल का है व युवा पीढी को उनके अनुरूप तैयार करने की आवश्यकता है। समाज द्वारा किये जा रहे प्रयासों की प्रशंसा करनी चाहिये परन्तु नई पीढी कैसे भाषा को सीखे इसके लिये अतिरिक्त प्रयत्न करने की आवश्यकता है।
गोष्ठी में स्वागत भाषण महासचिव हरी चन्दनानी व आभार संरक्षक गिरधर तेजवाणी ने प्रकट किया व संचालन महेश टेकचंदाणी ने किया।
समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुडे शिक्षाविदों, साहित्यकार व समाजसेवियों ने सुझाव दिया कि सिन्धी समाज के परिवारों में सिन्धी भाषा का उपयोग हो जिससे नई पीढ़ी को बोलचाल में नियमितता आ सके। उन्होनें कहा कि हमें अपने खानपान, संगीत कहानियां व मुहावरे, दादा दादी व नाना नानी से कहानियां, सिन्धी दरबारों की जानकारी उपलब्ध करवानी चाहिए। जिसमें हरकिशन टेकचंदाणी, प्रकाश हासाणी, सरिता टहिल्याणी, अजीत पमनाणी, योगेश, महेश चोटराणी, लाल नाथाणी, कैलाश लख्याणी लक्षमण चंदीरामाणी सहित पदाधिकारी उपस्थित थे।

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