शिक्षा का उद्देश्य विवेकशील, संस्कारवान और उत्तरदायी नागरिकों का निर्माण : देवनानी
स्पीकर देवनानी ने उदयपुर में विद्याभवन सोसायटी के ‘शिक्षा से प्रशासन’ संवाद में लिया भाग
अजमेर (अजमेर मुस्कान)। राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि भारत को साक्षरता से आगे बढ़कर वास्तविक अर्थों में शिक्षित राष्ट्र बनाने की आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल अक्षर ज्ञान अथवा प्रमाणपत्र प्राप्त करना नहीं, अपितु व्यक्ति में विवेक, नैतिकता, संस्कार, निर्णय क्षमता और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प की सिद्धि के लिए शिक्षित समाज से उत्तरदायी प्रशासन और उत्तरदायी प्रशासन से विकसित राष्ट्र की यात्रा को गति प्रदान करनी होगी। इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था में संवेदनशीलता, समन्वय, पारदर्शिता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व का भाव अनिवार्य है।
देवनानी शुक्रवार को उदयपुर स्थित विद्याभवन सोसायटी के सभागार में आयोजित ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘Education to Administration’ विषयक परिचर्चा में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने शिक्षक के रूप में अपने अनुभवों और सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षक का कार्य केवल विद्यार्थियों को विषयगत ज्ञान प्रदान करना नहीं, उनके व्यक्तित्व, विचार और चरित्र को ऐसी दिशा देना है, जिससे वे जीवन में अपने ज्ञान का उपयोग समाज एवं राष्ट्र के हित में कर सकें। शिक्षण से प्राप्त अनुभव ने उन्हें मनुष्य की जिज्ञासाओं, सामाजिक परिस्थितियों और जनअपेक्षाओं को समझने की दृष्टि प्रदान की। सार्वजनिक जीवन में भी यही संवेदनशीलता और संवादशीलता प्रभावी भूमिका निभाती है।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि राजनीति, प्रशासन और शिक्षा तीनों क्षेत्रों का मूल उद्देश्य समाज का कल्याण और व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाना है। इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के आचरण में कथनी और करनी की एकरूपता होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीयता का आधार केवल व्यक्त किए गए विचार नहीं, उन विचारों के अनुरूप किए गए कार्य होते हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में नियमों और प्रक्रियाओं के साथ मानवीय संवेदनाओं का समन्वय आवश्यक है। किसी भी निर्णय की सार्थकता इस बात से निर्धारित होती है कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक किस प्रकार पहुँचता है।
देवनानी ने कहा कि शिक्षा और प्रशासन के मध्य संवाद की ऐसी पहलें विशेष महत्त्व रखती हैं। शिक्षक समाज के भविष्य का निर्माण करता है और प्रशासन उस भविष्य के लिए अनुकूल सामाजिक एवं संस्थागत परिस्थितियाँ निर्मित करता है। जब शिक्षण संस्थानों में विकसित नैतिक मूल्य प्रशासनिक कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनते हैं, तब शासन व्यवस्था अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनती है। इसलिए शिक्षा को जीवन, व्यवहार और लोकसेवा से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
कार्यक्रम में केरलम के पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त डॉ. विश्वास मेहता की पुस्तक ‘Sands to Shores’ का विमोचन भी किया गया। श्री देवनानी ने डॉ. मेहता को पुस्तक के प्रकाशन पर शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि प्रशासनिक अनुभवों, जीवन के विविध पड़ावों और विचारों को साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्त करना ज्ञान के आदान-प्रदान की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। ऐसे साहित्यिक एवं बौद्धिक प्रयास भावी पीढ़ी को अनुभवों से सीखने और अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाने का अवसर प्रदान करते हैं।
इस अवसर पर राजस्थान के राज्यपाल के उच्च शिक्षा सलाहकार एवं महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के पूर्व कुलपति प्रो. कैलाश सोडाणी, विद्याभवन सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. जितेन्द्र तैलिया, मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं सेवानिवृत्त आईएएस राजेन्द्र भट्ट तथा विद्याभवन ग्रामीण संस्थान की निदेशक एवं कार्यक्रम की संचालक डॉ. कनिका शर्मा सहित शिक्षाविद्, प्रशासनिक अधिकारी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।


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